Wednesday, 14 February 2018

आज भी है...

आज भी है...
कभी साथ घुमा करते थे
उन्ही रास्तों से भटकते अकेले हम आज भी है ...
देर तक राह तकते थे 
उन्ही गलियों से गुजरते हम आज भी है ...

यादो की किताब लिखने निकले थे
पन्नोें पे आपकी छबि में मगरूर हम आज भी है ....
सपनो में भी आपकी तलाष करते थे
हकीकत में अपनो से दूर हम आज भी है ......

कानो में गूंजते वो आपके लब्ज थे
मिठास वही सुनने को बेक़रार हम आज भी है ....
चोरी चोरी मिलके वादे किया करते थे
वादे निभानेवाले को मगर ढूंढ़ते हम आज भी है......

©स्वलिखीत 
प्रदीप्त (प्रा.प्रदिप वराडे)
औरंगाबाद.
7588075845

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