Friday, 12 May 2017

मुसाफिर हूं......

       मुसाफिर हूं......

जाने क्यूँ लोग कहते कि काफिर हूं
राह चलता मैं तो बस एक मुसाफिर हूं......

समझ नहि आते ये बातें लोगो की
कभी तारीफ तो कभी तौहीन की
भौकते है लोग मैं जिता "उसके" खातीर हूं
राह चलता.....

दुनिया वाले डूब रहे है पैसो के समन्दर में
जिंदगी गवां रहे है कागजों कि कश्ती में
अपने लिये जी लूं इतना मैं शातीर हूं
राह चलता.....

बिना मेहनत के आसमाँ छुना चाहते है
पल में रुका दे जिंदगी ऐसे शौक पालतें है
खुद कमाके खाऊं इतना मैं काबिल हूं
राह चलता.....

कहते कुछ तो दिल में छिपाते कुछ और है
माँ बाप भी बच्चो को सिखाते कुछ और है
जिंदगी से सिखो यही कहने हाजिर हूं....
राह चलता.....


©स्वलिखीत 
प्रदीप्त (प्रा.प्रदिप वराडे)
औरंगाबाद.
7588075845

Monday, 8 May 2017

*रक्त सळसळते*

*रक्त सळसळते*

गुदमरल्या श्वासाने आज माझी मायभूमी विव्हळते
आठव पुत्रा तुझ्यामध्ये ही रक्त आहे सळसळते ।।

तरुणांचा देश ऐसा मागास कैसा
पोकळ गप्पा नसे जवळ फुटका पैसा
लाचार युवाना पाहून अंतःकरण कळवळते...

स्वप्नात जगण्याची हौस भारी
बापाच्या जीवावर मौज सारी
भ्रमित युवकातील कल्पकता गुदमरते.....

स्वतःकडून नसते कशाची अपेक्षा
सदैव स्वीकारे इतरांची उपेक्षा
तरुणाई देखील अंतर्मनात तडफडते....

नसे अभिमान माता पित्याचा
तीरस्कार मनी आप्त स्वकीयांचा
तिरस्कारी पुत्र पाहून मातृत्व विषन्नते.....

भिकारडे विचार त्यागून दे
कर्तुत्वाला जागवून दे
खडे बोल मग *प्रदीप्त* चे झनझनते...

आठव पुत्रा तुझ्यामध्ये ही रक्त आहे सळसळते ।।

©स्वलिखीत 
प्रदीप्त (प्रा.प्रदिप वराडे)
औरंगाबाद.
7588075845

सजदे में तुम्हारे हमें झुकने दो....

जब से तेरा प्यार मिला है  शायद खुद को खो दिया है थोड़ा ही सही प्यार निभाने दो  सजदे में तुम्हारे हमें झुकने दो.... भरी आंखों से ...