Friday, 12 May 2017

मुसाफिर हूं......

       मुसाफिर हूं......

जाने क्यूँ लोग कहते कि काफिर हूं
राह चलता मैं तो बस एक मुसाफिर हूं......

समझ नहि आते ये बातें लोगो की
कभी तारीफ तो कभी तौहीन की
भौकते है लोग मैं जिता "उसके" खातीर हूं
राह चलता.....

दुनिया वाले डूब रहे है पैसो के समन्दर में
जिंदगी गवां रहे है कागजों कि कश्ती में
अपने लिये जी लूं इतना मैं शातीर हूं
राह चलता.....

बिना मेहनत के आसमाँ छुना चाहते है
पल में रुका दे जिंदगी ऐसे शौक पालतें है
खुद कमाके खाऊं इतना मैं काबिल हूं
राह चलता.....

कहते कुछ तो दिल में छिपाते कुछ और है
माँ बाप भी बच्चो को सिखाते कुछ और है
जिंदगी से सिखो यही कहने हाजिर हूं....
राह चलता.....


©स्वलिखीत 
प्रदीप्त (प्रा.प्रदिप वराडे)
औरंगाबाद.
7588075845

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