यादों कि बुंदे
आज फिरसे बारिश कि बुंदे आई थी
तुम्हारी उन यादों को साथ लायी थी
डरता नहीं उन यादों से बस
तनहा ठहर जाता हूँ उन वादों से ....
वादे !...जो तुने मुझसे
और मैने तुझसे किये थे
कभी तनहाई में जब
हम एक दुजे से मिले थे
हाथों में तुम्हारा
हाथ जो थमा या था
आंखों में सपनों से
घर को सजाया था
ऊस वक्त कि यादों को बुंदो में समेटा था
हर एक बुंद को मैने
गौर से तराशा
पर वह यादोवाला बुंद
दे गया निराशा .....
आज बुंदो ने फिरसे तुम्हारी याद दिला दी
सुखे इस चेहरे पर एक मुस्कान खिला दी..