Monday, 28 May 2018

यादों कि बुंदे

यादों कि बुंदे

आज फिरसे बारिश कि बुंदे आई थी
तुम्हारी उन यादों को साथ लायी थी

डरता नहीं उन यादों से बस 
तनहा ठहर जाता हूँ उन वादों से ....

वादे !...जो तुने मुझसे 
और मैने तुझसे किये थे 
कभी तनहाई में जब 
हम एक दुजे से मिले थे
हाथों में तुम्हारा 
हाथ जो थमा या था 
आंखों में सपनों से 
घर को सजाया था
ऊस वक्त कि यादों को बुंदो में समेटा था
हर एक बुंद को मैने 
गौर से तराशा 
पर वह यादोवाला बुंद 
दे गया निराशा .....

आज बुंदो ने फिरसे तुम्हारी याद दिला दी
सुखे इस चेहरे पर एक मुस्कान खिला दी..

©स्वलिखीत

प्रदीप्त (प्रा.प्रदिप वराडे)

औरंगाबाद.7588075845


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