Monday, 12 March 2018

ना मौत का खौफ ....

चल पडे है मंजील की ऱाह पर
ना मौत का खौफ ना खतरों का डर...


लीय़े अंगार आँखो में

भरा हौसला सिने में

तैयार खडे मैदान में

ना छोडेंगे जीद ना ऱुकेगा स्वर ....


दील में बसा एक ख्वाब है

छुना हमें अब आसमाँ है 

पाना दीलों में सम्मान है

ना लडखडायें कदम ना कतरायें लब्ज...


मन में लगी जो आग है

साहस भरी अब सास है

नवनिर्माण की आस है

ना रुकेगा क्रम ना झुकेंगे सर...



©स्वलिखीत

 प्रदीप्त (प्रा.प्रदिप वराडे)

औरंगाबाद.7588075845

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